मोहम्मद आलम प्रधान संपादक
(alamkikhabar.com)
पटना/समस्तीपुर। समस्तीपुर जिले की ऐतिहासिक रामेश्वर जूट मिल के बंद होने का मामला अब बिहार विधान सभा तक पहुंच गया है। कल्याणपुर विधानसभा क्षेत्र के विधायक महेश्वर हजारी ने चल रहे सत्र के दौरान नियम-104 के तहत ध्यानाकर्षण सूचना देकर सरकार का ध्यान इस गंभीर मुद्दे की ओर आकृष्ट कराया है। उन्होंने इसे अत्यंत महत्वपूर्ण जनहित का विषय बताते हुए कहा कि मिल के बंद होने से हजारों मजदूरों के सामने भुखमरी जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई है।
विधायक ने सदन को अवगत कराया कि रामेश्वर जूट मिल 1 नवंबर 2025 से पूरी तरह बंद पड़ी है। मिल के बंद होने के कारण यहां काम करने वाले हजारों श्रमिक बेरोजगार हो गए हैं और उनके परिवार आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि मिल प्रबंधन के मजदूर विरोधी रवैये के चलते वर्षों में यहां काम करने वाले मजदूरों की संख्या लगभग 5000 से घटकर महज 800 रह गई थी, जिससे श्रमिकों की स्थिति लगातार खराब होती चली गई।
ध्यानाकर्षण सूचना में यह भी उल्लेख किया गया कि करीब 4200 मजदूर, जो या तो सेवानिवृत्त हो चुके हैं अथवा जिनकी मृत्यु हो चुकी है, उनके भविष्य निधि (पीएफ) की करोड़ों रुपये की राशि अब भी मिल प्रबंधन के पास बकाया है। साथ ही उनके स्थान पर नए श्रमिकों की नियुक्ति भी नहीं की गई, जिससे उत्पादन क्षमता लगातार प्रभावित होती रही।
विधायक ने यह गंभीर आरोप भी लगाया कि मिल मालिक ने जूट मिल को संचालित करने के नाम पर बैंकों से करोड़ों रुपये का ऋण लिया, लेकिन उस राशि का उपयोग मिल के आधुनिकीकरण या संचालन में नहीं किया गया। बल्कि आरोप है कि राशि को अन्य मदों में निवेश कर दिया गया, जिसके कारण मिल की स्थिति बद से बदतर होती चली गई। इतना ही नहीं, मिल की कई मशीनों के महत्वपूर्ण पुर्जों को खोलकर बेच दिए जाने की भी बात सामने आई है, जिससे मिल को दोबारा चालू करना और कठिन हो गया है।
महेश्वर हजारी ने सरकार से मांग की है कि इस मामले में त्वरित हस्तक्षेप कर मिल को जल्द से जल्द चालू कराया जाए, ताकि हजारों श्रमिकों को पुनः रोजगार मिल सके और उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हो। उन्होंने कहा कि यह केवल एक औद्योगिक इकाई का मामला नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के भविष्य से जुड़ा गंभीर सामाजिक-आर्थिक प्रश्न है।
इस मुद्दे के विधानसभा में उठने के बाद अब सरकार की कार्रवाई पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि क्षेत्रीय विकास, रोजगार और श्रमिकों के अधिकार से जुड़ा यह मामला लंबे समय से समाधान की प्रतीक्षा कर रहा है।
बंद रामेश्वर जूट मिल — मजदूरों की चुप चीख और व्यवस्था की परीक्षा
समस्तीपुर की रामेश्वर जूट मिल का बंद होना सिर्फ एक उद्योग के ठप पड़ने की घटना नहीं है, बल्कि यह हजारों मजदूर परिवारों की टूटती उम्मीदों, बिखरते जीवन और प्रशासनिक उदासीनता की एक दर्दनाक कहानी है। जब कोई मिल बंद होती है तो उसकी मशीनें ही नहीं रुकतीं, बल्कि उससे जुड़े हजारों घरों के चूल्हे ठंडे पड़ जाते हैं।
1 नवंबर 2025 से बंद पड़ी इस जूट मिल ने लगभग पांच हजार मजदूरों की रोज़ी-रोटी छीन ली है। आज स्थिति यह है कि हजारों परिवार आर्थिक संकट के ऐसे दौर से गुजर रहे हैं, जहां सम्मान के साथ जीवन जीना भी चुनौती बन गया है। यह विडंबना ही है कि जिस मिल ने कभी क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को मजबूती दी, वही आज जर्जर हालात में खड़ी होकर सरकारी और प्रशासनिक लापरवाही की गवाही दे रही है।
सबसे गंभीर पहलू यह है कि हजारों मजदूरों की पीएफ की करोड़ों रुपये की राशि वर्षों से बकाया बताई जा रही है। यह केवल आर्थिक अन्याय नहीं, बल्कि श्रमिकों के अधिकारों का खुला उल्लंघन है। जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी मिल के नाम कर दी, आज वही मजदूर या उनके परिवार अपने ही मेहनत की कमाई के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं।
मिल प्रबंधन पर लगे आरोप — बैंकों से ऋण लेकर उसका उपयोग उत्पादन के बजाय अन्य निवेश में करना और मशीनों के पुर्जे तक बेच देना — यदि सत्य हैं, तो यह केवल कुप्रबंधन नहीं बल्कि आर्थिक अपराध की श्रेणी में आता है। ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई होना ही न्याय की पहली शर्त है।
इस मुद्दे का विधानसभा में उठना निश्चित रूप से एक सकारात्मक कदम है, लेकिन अब असली परीक्षा सरकार की है। क्या केवल चर्चा से मजदूरों की जिंदगी बदलेगी? या फिर ठोस कार्रवाई कर मिल को पुनर्जीवित किया जाएगा? यह सवाल आज पूरे क्षेत्र की जनता पूछ रही है।
रामेश्वर जूट मिल को पुनः चालू करना केवल एक औद्योगिक निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का प्रश्न है। इससे रोजगार लौटेगा, क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी और सबसे महत्वपूर्ण — मजदूरों के टूटे भरोसे को सहारा मिलेगा।
सरकार के सामने आज स्पष्ट विकल्प है — या तो यह मिल इतिहास का एक और बंद अध्याय बन जाए, या फिर इसे पुनर्जीवित कर हजारों परिवारों के जीवन में फिर से उम्मीद की रोशनी जगाई जाए। समय की मांग है कि संवेदनशीलता, पारदर्शिता और दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ इस संकट का स्थायी समाधान निकाला जाए।